जानिए कौन कौन से राज्यों के लोगो में कितना एंटीबाडी मिला है: People Antibody in Various States of India

By | July 29, 2021

People Antibody in Various States of India :- MP, UP और राजस्थान समेत 8 राज्यों में 70% से ज्यादा लोगों में एंटीबॉडी मिलीं, यह देश के औसत 67.6% से ज्यादा.

People Antibody in Various States of India
India People Antibody in Various States

People Antibody in Various States of India

People Antibody in Various States of India :- देश के 21 राज्यों में किए गए एक सर्वे में सामने आया है कि यहां की दो-तिहाई आबादी में कोरोना वायरस एंटीबॉडी डेवलप हुई हैं. 79% एंटीबॉडी के साथ मध्य प्रदेश सबसे आगे है, जबकि सिर्फ 44.4% एंटीबॉडी के साथ केरल सबसे पीछे है. चिंता की बात यह है कि फिलहाल देश में सबसे ज्यादा संक्रमण के मामले केरल में ही सामने आ रहे हैं.

इंडियन मेडिकल रिसर्च काउंसिल (ICMR) की तरफ से 14 जून से 16 जुलाई के बीच कराए गए सीरो सर्वे की रिपोर्ट बुधवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने जारी की है. देश के 70 जिलों में ICMR का यह चौथा सीरो सर्वे है. किसी आबादी के ब्लड सीरम में एंटीबॉडी के लेवल को सीरोप्रिवलेंस या सीरोपॉजिटिविटी कहा जाता है.

राज्य कराएं अपना सीरो सर्वे

इन नतीजों को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों को सुझाव दिया है कि वे ICMR के दिशा-निर्देश में अपनी खुद की सीरोप्रिवलेंस स्टडी कराएं। उस सीरो सर्वे के नतीजों को कोरोना के बेहतर नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा.

ICMR के सीरो सर्वे नेशनल लेवल पर कोविड इंफेक्शन के फैलाव को समझने के लिए डिजाइन किया गया था. लिहाजा इसके नतीजे जिलों और राज्यों के बीच सीरोप्रिवलेंस की विविधता या वैराइटी नहीं दिखाते हैं.

एंटीबॉडी टेस्ट को कहते हैं सीरो सर्वे

किसी आबादी के ब्लड सीरम में एंटीबॉडी की मौजूदगी पता लगाने के टेस्ट को सीरो-स्टडी या सीरो सर्वे कहते हैं. अगर इस टेस्ट में किसी व्यक्ति में किसी एंटीबॉडी का स्तर बहुत ज्यादा मिलता है, तो इससे समझा जा सकता है कि उस व्यक्ति को इन्फेक्शन पहले हो चुका है. इससे कोरोना वायरस की मौजूदगी और उसके फैलाव के ट्रेंड को मॉनिटर करने में मदद मिलती है.

सामान्य तौर पर सीरो टेस्ट ऐसी आबादी पर किया जाता है, जिसके नतीजों को पूरे देश की आबादी पर इस्तेमाल किया जा सके. आबादी का चुनाव कई सैंपलिंग तकनीकों से किया जाता है. सीरो सर्वे बड़ी आबादी पर किए जाने की जरूरत नहीं होती है.

राज्यएंटीबाडी प्रतिशत
मध्यप्रदेश79.0
राजस्थान76.2
बिहार75.9
गुजरात75.3
छत्तीसगढ़74.6
उत्तराखंड73.1
उत्तर प्रदेश71.0
आँध्रप्रदेश70.2
कर्णाटक69.8
तमिलनाडू69.2
ओडिशा68.1
पंजाब66.5
तेलंगाना63.1
जम्मू कश्मीर63.0
हिमांचल प्रदेश62.0
झारखण्ड61.2
पश्चिन बंगाल60.9
हरियाणा60.1
महाराष्ट्र58.0
असम50.3
केरल44.4
People Antibody Level in Various States of India

क्यों एक बार शरीर में बनी ऐंटिबॉडीज जीवनभर कोरोना से नहीं बचाएंगी?

Why Lifetime Immunity Is Not Possible Through Antibodies In Covid-19 And Corona Virus
Why Lifetime Immunity Is Not Possible Through Antibodies In Covid-19 And Corona Virus

एक बार शरीर में ऐंटिबॉडीज बन जाने के बाद वे आपको अगले कुछ महीनों के लिए वायरस से सुरक्षा दे सकती हैं. लेकिन लाइफ टाइम सुरक्षा की गारंटी नहीं. हालांकि कोरोना वायरस को लेकर अब तक यह माना जा रहा था कि जो व्यक्ति एक बार इस वायरस से संक्रमित होने के बाद ठीक हो जाएगा, फिर उसे दोबारा इस वायरस से संक्रमण का डर नहीं रहेगा. साथ ही अगर यह वायरस किसी कारण उस व्यक्ति के शरीर पर हावी भी हुआ तब भी वह व्यक्ति बेहद माइल्ड सिंप्टम्स के बाद ठीक हो जाएगा. लेकिन जैसे-जैसे इस वायरस से जुड़ी नई-नई जानकारी सामने आ रही है, प्राथमिक स्तर पर मिली सूचनाओं में बदलाव हो रहा है…

ऐंटिबॉडीज और टी-सेल्स का अंतर

सबसे पहले आपको ऐंटिबॉडीज और टी-सेल्स के बीच का अंतर समझना होगा. जब किसी व्यक्ति के शरीर में कोरोना वायरस प्रवेश कर जाता है तो उसके शरीर में मौजूद टी-सेल्स यानी वाइड ब्लड सेल्स उस वायरस को मारने और शरीर के उसी हिस्से तक सीमित रखने का काम करती हैं.

इतनी देर में शरीर का इम्यून सिस्टम उस वायरस को स्कैन करके उसके खिलाफ जरूरी ऐंटिबॉडीज का निर्माण करता है. ये ऐंटिबॉडीज महीन कोशिकाएं होती हैं जो हमारे ब्लड में घुली रहती हैं और वायरस पर अटैक करके उसे पूरी तरह खत्म करने का काम करती हैं.

इसके बाद टी-सेल्स उन सेल्स को खत्म कर देती हैं, जिन्हें वायरस ने संक्रमित कर दिया होता है. ताकि यह संक्रमण शरीर के किसी हिस्से में ना फैले और वायरस को फिर से बढ़ने का अवसर ना मिले.

वैक्सीन का क्या रोल रहेगा?

वैज्ञानिक कोरोना के खिलाफ जिस वैक्सीन का निर्माण करने में जुटे हैं, वह वैक्सीन व्यक्ति के शरीर में जाकर ऐंटिबॉडीज को अधिक मात्रा में तुरंत ऐक्टिव करती है. इससे वायरस जल्दी मर जाता है. साथ ही यह उन लोगों के लिए अधिक प्रभावी होती है, जिनके शरीर में वायरस प्रवेश करके उनके शरीर को कमजोर कर चुका होता है.

क्योंकि कोरोना वायरस सबसे पहले इंसान की रोगप्रतिरोधक क्षमता पर अटैक करता है, जिससे शरीर में ऐटिबॉडीज बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है और वायरस तेजी से बढ़ने लगता है. वैक्सीन इस वायरस के बढ़ने की गति को रोककर शरीर में फिर से ऐंटिबॉडीज के बनने की प्रक्रिया को तेज करती है.

लंबी सुरक्षा को लेकर क्यों है संदेह?

अब सवाल यह उठता है कि आखिर वैक्सीन को लेकर इस बात का संदेह क्यों जताया जा रहा है कि वैक्सीन लगने के बाद भी व्यक्ति कोरोना संक्रमित हो सकता है? तो इस प्रश्न का उत्तर यह है कि हमारे शरीर में वायरस के खिलाफ बनने वाली ऐंटिबॉडीज की लाइफ बहुत लंबी नहीं होती है.

ये ऐंटिबॉडीज कुछ ही महीनों में शरीर से गायब हो जाती हैं. लेकिन वैक्सीन लगने की अच्छी बात यह है कि हमारे इम्यून सिस्टम के अंदर वैक्सीन की स्कैन कॉपी सेव रहती है. जैसे ही यह वायरस किसी व्यक्ति पर अगली बार फिर से अटैक करता है, इम्यून सिस्टम बिना किसी देरी के बहुत तेजी के साथ ऐंटिबॉडीज जनरेट करना शुरू कर देता है.

इससे किसी व्यक्ति में दोबारा कोरोना संक्रमण होने की स्थिति में उसका शरीर इस वायरस से लड़ने के लिए पहले से अधिक तैयार रहेगा. इस बारे में यूनाइटेड स्टेट की वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी से जुड़े संक्रमण रोगों के विशेषज्ञ डॉक्टर Dr Buddy Creech का कहना है कि नई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि कोविड-19 के खिलाफ बननेवाली ऐंटिबॉडीज में से करीब आधी ऐंटिबॉडीज 73 दिनों के अंदर खत्म हो जाती हैं.

लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि इस वायरस से बचने के लिए लगाई गई वैक्सीन पूरी तरह व्यर्थ हो जाएगी. क्योंकि अगले कुछ महीनों के अंदर अगर यह वायरस व्यक्ति पर दोबारा अटैक करता है तो उस स्थिति में बहुत ही मामूली लक्षणों के साथ ठीक हो जाएगा. क्योंकि उस स्थिति में व्यक्ति का शरीर इस वायरस को ज्यादा दिन तक जीवित नहीं रहने देगा.

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