क्या है फोन और कम्प्यूटर का जासूस पेगासस स्पायवेयर ? Know Everything About Pegasus Spyware

By | July 21, 2021

Know Everything About Pegasus Spyware :- पेगासस स्पायवेयर, आपकी मर्जी के बगैर फोन का कैमरा चलाने से लेकर मैसेज पढ़ने में है सक्षम.

What is Phone and Computer spy - Pegasus spyware मैसेज पढ़ने में है सक्षम.
What is Pegasus Spyware how it Works

Know Everything About Pegasus Spyware :- फोन आपका, जासूस सरकार का, पेगासस स्पायवेयर, आपकी मर्जी के बगैर फोन का कैमरा चलाने से लेकर मैसेज पढ़ने में है सक्षम. जानिए पेगासस की हर बात और इससे बचने की ट्रिक.पेगासस जासूसी कांड के खुलासे के बाद देश के गृह मंत्री अमित शाह भले ही कहें कि इसकी क्रोनोलॉजी को समझें. यह लोकतंत्र को बदनाम करने की साजिश है, लेकिन उनके इस तर्क में दम नहीं दिखता. दरअसल, इस कांड का खुलासा अकेले भारत में नहीं हुआ. मामले की जांच 10 देशों के 17 मीडिया हाउस से जुड़े 80 पत्रकारों ने की. इस दौरान पेरिस के NGO फोरबिडन स्टोरीज और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 50 हजार से ज्यादा फोन नंबरों का पता लगाया जिन पर पेगासस से हमला किया गया.

क्या है फोन और कम्प्यूटर का जासूस पेगासस स्पायवेयर ? Know Everything About Pegasus Spyware

इन्वेस्टिगेशन में मिले नतीजों को उन्होंने पत्रकारों से साझा किया. उन्होंने कई महीनों तक यह पता किया कि ये फोन नंबर हैं किसके? इस कवायद में वे एक हजार से ज्यादा सरकारी अफसर, पत्रकार, कारोबारियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की पहचान कर सके. फोन हैकिंग के इस खुलासे के बाद पूरी दुनिया में हंगामा मच गया.

What is Pegasus Spyware how it Works :- एक तरफ सियासत गरम है, तो दूसरी तरफ लोग जानना चाहते हैं कि आखिर यह स्पायवेयर है क्या? आप खुद कैसे ऐसी जासूसी से अपने स्मार्टफोन और दूसरे डिवाइस को सुरक्षित रख सकते हैं?
तो आइए इस पेगासस और स्पायवेयर से जुड़े सभी जरूरी सवालों के जवाब जानते हैं …

What is Pegasus Spyware how it Works पेगासस जासूसी मामले में जारी की गई लिस्ट में 40 पत्रकारों के नाम शामिल हैं। इस लिस्ट में शामिल पत्रकारों का बस एक ही सवाल है कि क्या हम अपराधी हैं, देशद्रोही हैं? आखिर हमारी जासूसी क्यों? वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता जिनका नाम विवादास्पद लिस्ट में शामिल है, कहते हैं, ‘किसी भी व्यक्ति या फिर निजी संस्था के लिए पेगासस जासूसी नहीं करती. यह किसी सरकारी संस्था के लिए ही काम करती है. अगर यह जासूसी सरकार नहीं करवा रही तो फिर सवाल उठता है कि आखिर यह सरकारी संस्था है कौन? सरकार इस मामले में न हां कह रही है और ना हीं ना. सरकार को इस सरकारी संस्था का पता लगाना ही चाहिए. क्योंकि, इस तरह की जासूसी लोकतंत्र पर हमला है, बहुत बड़ा खतरा है.’

What is Pegasus Spyware how it Works वे कहते हैं, ‘यह कंपनी नशे का व्यापार करने वाले अपराधियों, बच्चों को टारगेट करने वाले पीडोफाइल, बच्चों का अपहरण करने वाले अपराध से जुड़े मामलों की पड़ताल के लिए अपनी सेवाएं प्रदान करती है. तो सवाल उठता है कि क्या हम इनमें से कोई एक हैं?’ वरिष्ठ पत्रकार स्मिता शर्मा, जिनका नाम भी इस लिस्ट में शामिल है. वे कहती हैं कि सरकार कह रही है कि हम इस जासूसी के पीछे नहीं हैं. लेकिन सिर्फ सफाई देने से तो काम नहीं चलेगा. सरकार को इस मामले की जांच करवानी चाहिए ताकि पता चल सके इसके पीछे है कौन?’

Pegasus Spyware Attack Mobile Phones
Pegasus Spyware Attack Mobile Phones

What is Pegasus Spyware how it Works वे सवाल उठाती हैं कि अगर केंद्र सरकार इसमें शामिल नहीं है तो क्या गृह मंत्रालय या कोई और सरकारी एजेंसी इसमें शामिल है? क्या कोई राज्य सरकार ऐसा कर रही है या फिर कोई कॉर्पोरेट घराना इसके पीछे है. इसलिए इसकी जांच बेहद जरूरी है ताकि इसके पीछे कौन है ये पता चल सके.

इस सूची में शामिल वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय भी इस पूरे जासूसी प्रकरण की जांच सरकार द्वारा करने की मांग करते हैं, वे कहते हैं, सरकार कह रही है कि हमने जासूसी नहीं करवाई, तो यह और भी गंभीर मुद्दा है, क्योंकि फिर यह देश की सुरक्षा व्यवस्था में बड़ी सेंध है.

क्या सरकार से सवाल पूछने वालो की हो रही निगरानी?

स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह एक कदम और आगे बढ़कर सवाल उठाते हैं।.वे कहते हैं, ‘आप 40 पत्रकारों की प्रोफाइल उठाकर देखिए, वे सब उनमें शामिल हैं जो सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हैं. जनविरोधी नीतियों का भंडाफोड़ करते हैं. मैं लगातार बस्तर में उन आदिवासियों के हक में लिख रहा हूं जिन्हें माओवादी बताकर हत्या की जा रही है. जेल में ठूंसा जा रहा है.’

रूपेश कहते हैं कि 2017 में मैंने झारखंड के गिरिडीह जिले के पारसनाथ पर्वत पर 9 जून को आदिवासी डोली मजदूर मोतीलाल बास्के की CRPF कोबरा द्वारा फर्जी मुठभेड़ में ‘माओवादी’ बताकर की गई हत्या पर खुलकर रिपोर्ट की. मेरी रिपोर्ट के बाद यह मुद्दा नेशनल मीडिया में भी आया. उसके बाद से मुझ पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरह से दबाव बनाया जाना शुरू किया गया. रूपेश की इस बात में दम इसलिए नजर आता है क्योंकि पत्रकारों की सूची उठाकर देखो तो ज्यादातर पत्रकार इसमें वे शामिल हैं जो कहीं न कहीं सरकार या उनके नजदीकियों पर सवाल खड़े करते आए हैं.

Pegasus Spyware Effect in India Politics
Pegasus Spyware Effect in India Politics

न्यूजक्लिक में परंजॉय ने एक सीरीज की थी, जिसमें अडानी के पक्ष में उस वक्त सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा फैसले सुनाने का आरोप तथ्यपरक ढंग से लगाया गया था. इतना ही नहीं, साल 2014 में उनकी एक किताब पब्लिश हुई जिसका शीर्षक था, Gas Wars: Crony Capitalism and the Ambanis. इस किताब ने तहलका मचा दिया था.

2016 में वे इकोनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (EPW) के संपादक बने. उन्होंने एक आर्टिकल लिखा कि कैसे अडानी ग्रुप को सरकार की नीतियों से फायदा पहुंचा? उसके बाद उन्हें मानहानि का नोटिस भेजा गया. यह कोई छोटा मोटा मसला नहीं था, 500 करोड़ का मामला था. ठाकुरता को मैगजीन से इस्तीफा देना पड़ा. ये केवल बानगी है, ऐसे कई और लेख और किताबें ठाकुरता ने लिखे साथ ही कई डाक्यूमेंट्री भी बनाईं.

द वायर के कई पत्रकारों का नाम इस सूची में शामिल है. द वायर की ‘पत्रकारिता’ से भी आम लोग परिचित ही हैं. लिहाजा यह सवाल उठना जायज है कि क्या उन्हीं पत्रकारों की जासूसी हुई जिन्होंने सरकार या उनके करीबी माने जाने वाले औद्योगिक घरों से सवाल पूछे? स्मिता शर्मा कहती हैं, ‘यह कोई नया मामला नहीं है ऐसा दशकों से होता रहा है अनेक ऐसी सरकारें आईं जिनको अपनी आलोचना पसंद नहीं है और कड़े सवाल पूछा जाना पसंद नहीं है.’

सूची तो अभी जारी हुई पर हमें अंदाजा था कि हमारे फोन पर कोई निगरानी कर रहा है? परंजॉय ठाकुरता कहते हैं, ‘मार्च में चेन्नई से एक आदमी मेरे पास आया था, जिसने मुझसे कहा था आपके फोन की निगरानी की जा रही है.

फ़ोन में कॉल करते वक्त अजीब सी *बीप* सुने देती थी

फ्रांस के दो व्यक्तियों ने इसके बाद मुझसे संपर्क साधा और मेरे फोन पर निगरानी होने की बात कही। उन्होंने कहा, ‘आपका डेटा हमें चाहिए होगा, आप चिंता न करें इससे छेड़छाड़ नहीं होगी, यह पूरी तरह सुरक्षित रहेगा.’ जांच के बाद मैं हैरान था क्योंकि मार्च-अप्रैल 2018 से मेरे फोन की निगरानी चालू थी.’

रूपेश कुमार ने भी बताया कि फर्जी मुठभेड़ में एक आदिवासी की हत्या के खिलाफ जब जनांदोलन तेज हो गया, तो मेरे फोन में कॉल करते वक्त अजीब सी ‘बीप’ सुनाई देती थी. 4 जून, 2019 को मैं अपने अधिवक्ता मित्र के साथ रामगढ़ से औरंगाबाद जा रहा था. रास्ते में ही सेंट्रल IB ने मुझे और मेरे ड्राइवर को उठा लिया.

हमें बिहार के गया जिले के तहत आने वाले कोबरा 205 बटालियन के स्थायी कैंप में 2 दिन तक हिरासत में रखा गया. इंटेरोगेशन के दौरान सेंट्रल IB ने मुझे बताया भी कि आपके फोन पर निगरानी की जा रही है. बाद में मेरे ऊपर UAPA की 6 संगीन धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर जेल में बंद कर दिया गया था.

वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय कहते हैं, ‘मेरे पास कनाडा से 2-3 बार फोन आया. लेकिन, बात एक ही बार हुई. मुझे लगा कि यह कोई ट्रैप न हो. मैंने अपने सूत्रों से पता लगाया तो पता चला कि मेरे लेखों से सरकार को दिक्कत है. सरकार चिंतित है क्योंकि मेरे लेखों का असर लोगों के दिमाग तक होता है. इसलिए मुझ पर नजर रखी जा रही है.

पेगासस स्पायवेयर से कथित जासूसी मामले में सरकार की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. इसी बीच भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने मोदी सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा, ‘यह बिल्कुल साफ है कि पेगासस स्पायवेयर एक कमर्शियल कंपनी है, जो पेड कॉन्ट्रैक्ट्स पर काम करती है. इसलिए यह सवाल लाजमी है कि ऑपरेशन के लिए उन्हें किसने पैसे दिए? भारत सरकार नहीं तो कौन? भारत की जनता को सच्चाई से वाकिफ कराना मोदी सरकार का फर्ज है.’

इसके बाद कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने कहा कि पेगासस एक प्रोडक्ट है, NSO इजराइल की कर्मिशियल कंपनी है. आपके पसंदीदा देशों में से एक. आप इकलौते व्यक्ति हैं, जो मोदी-शाह और NSO से वो फैक्ट निकाल सकते हैं, जो आप जानना चाहते हैं. उन्हें किसने भुगतान किया? यह सवाल लाजमी है.

इजराइली PM को चिट्ठी लिखें मोदी : स्वामी

वहीं, स्वामी ने कहा कि अगर हमारे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो प्रधानमंत्री मोदी को चाहिए कि वह इजराइली प्रधानमंत्री को चिट्‌ठी लिखें और NSO पेगासस प्रोजेक्ट का पता लगाएं. यह भी पता लगाया जाए कि इसके लिए किसने खर्च किया.

क्या है पूरा मामला?

2019 में राज्यसभा में तीखी बहस की वजह रहा पेगासस स्पायवेयर एक बार फिर सुर्खियों में हैं. न्यूज पोर्टल ‘द वायर’ ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि भारत सरकार ने 2017 से 2019 के दौरान करीब 300 भारतीयों की जासूसी की है. इन लोगों में पत्रकार, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, विपक्ष के नेता और बिजनेसमैन शामिल हैं. सरकार ने पेगासस स्पायवेयर के जरिए इन लोगों के फोन हैक किए थे. हालांकि, सरकार ने सफाई देते हुए सभी आरोपों को निराधार बताया है.

पेरिस की एक संस्था फॉरबिडन स्टोरीज और एमनेस्टी इंटरनेशनल के पास करीब 50 हजार फोन नंबर्स की एक लिस्ट है. इन संस्थानों का दावा है कि ये वो नंबर है, जिन्हें पेगासस स्पायवेयर के जरिए हैक किया गया है.
इन दोनों संस्थानों ने इस लिस्ट को दुनियाभर के 16 मीडिया संस्थानों के साथ शेयर किया है। हफ्तों के इन्वेस्टिगेशन के बाद खुलासा हुआ है कि अलग-अलग देशों की सरकारें पत्रकारों, विपक्षी नेताओं, बिजनेसमैन, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और वैज्ञानिकों समेत कई लोगों की जासूसी कर रही हैं.

इस सूची में भारत का भी नाम है. न्यूज पोर्टल ‘द वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जिन लोगों की जासूसी की गई है उनमें 300 भारतीय लोगों के नाम शामिल हैं. जासूसी के लिए इजराइली कंपनी द्वारा बनाए गए स्पायवेयर पेगासस का इस्तेमाल किया गया है.

केंद्र सरकार की सफाई

इस पूरे मामले पर इलेक्ट्रॉनिक्स और IT मंत्रालय ने सफाई दी है. मंत्रालय ने कहा है कि भारत एक मजबूत लोकतंत्र है और अपने नागरिकों के निजता के अधिकार के लिए पूरी तरह समर्पित है. सरकार पर जो जासूसी के आरोप लग रहे हैं वो बेबुनियाद हैं.

कंपनी ने कहा हम निजी कंपनियों से डील नहीं करते

पेगासस को बनाने वाली कंपनी का कहना है कि वो किसी निजी कंपनी को यह सॉफ्टवेयर नहीं बेचती है, बल्कि इसे केवल सरकार और सरकारी एजेंसियों को ही इस्तेमाल के लिए देती है. इसका मतलब है कि अगर भारत में इसका इस्तेमाल हुआ है, तो कहीं न कहीं सरकार या सरकारी एजेंसियां इसमें शामिल हैं.

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